window.dataLayer = window.dataLayer || []; function gtag(){dataLayer.push(arguments);} gtag('js', new Date()); gtag('config', 'G-MV9Z2YX5QS'); "आदित्य हृदय स्तोत्रम्"

“आदित्य हृदय स्तोत्रम्”

आदित्य हृदय स्तोत्रम् 
भगवान सूर्यनारायण

“आदित्य हृदय स्तोत्रम्” सूर्य देव की स्तुति है ,जन्म कुंडली में सूर्य के  शुभ प्रभाव को बढ़ाने नौकरी व्यापार आदि में उन्नति के लिए आदित्य हृदय स्तोत्र का पाठ अति लाभदायक होता है । यह स्तोत्र व्यक्ति का तेज बढ़ाने में सहायक होता  है यह स्तोत्र बाल्मीकि रामायण के लंका कांड में राम रावण युद्ध के समय अगस्त ऋषि के द्वारा राम को आदित्य हृदय स्तोत्र पाठ का उपदेश दिया गया था ।

“अथ आदित्य हृदय स्तोत्रम्”

                          विनियोगः

ॐ अस्य श्री आदित्य हृदय स्तोत्रस्य अगस्त्य ऋषि अनुष्टुप छंद आदित्य हृदय भूतो भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया  ब्रह्मा विद्या सिद्धौ   सर्वत्र जय सिद्धौ   च  विनियोगः

आदित्य हृदय स्तोत्र के ऋषि अगस्त्य छन्द  अनुष्टुप देवता सूर्य के हृदय रूप भगवान ब्रह्मा है और इसके पाठ का उपयोग समस्त दिन बाधाओं के निवारण सहित ब्रह्म विद्या की सिद्धि और सब कार्यों में सफलता के लिए किया जाता है।

                         ऋष्यादिन्यास

ऋषि आदि की स्थापना पाठ से पहले इस प्रकार करें ।

अगस्त्यऋषये नमः सिरसि । अनुष्टुप छंदसे  नमः,मुखे ।  आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै  नमः ह्रदि । ओम बीजाय नमः गुहे । रश्मिमते शक्तये   पादयोः । तत्सवितुरित्यादिगायत्री कीलकाय नमः नाभौ ।

अगस्त्य ऋषि को नमस्कार है कहकर दाहिने हाथ से शिर का  स्पर्श करें ।

ॐअनुष्टुप छंद को नमस्कार करके मुंह को स्पर्श करें।

ॐआदित्य  के हृदय रूप ब्रह्मा देवता को नमस्कार कहकर हृदय को  स्पर्श करें।

ॐ बीज मंत्र को नमस्कार कहकरके शरीर के गुह्य भागो का स्पर्श करें । 

ॐकिरणों की शक्ति को नमस्कार कहकर दोनों पैरों को  स्पर्श करें।

ॐ उस सविता देवता इत्यादि गायत्री मंत्र के तिलक को नमस्कार कहकर नाभि के छेद वाले स्थान को दाहिने हाथ से स्पर्श करें । इसी प्रकार करन्यास और  हृदयादि न्यास भी करें

                               करन्यास

ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः ।  देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यामं नमः।  ॐविवस्वते अनामिकाभ्यां नमः  ।ॐ भास्कराय कनिष्ठाभ्यां नमः। ॐभुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।

                         हृदयादि अंग न्यास   

ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः । समुद्यते शिरसि  नमः ।  देवासुरनमस्कृताय शिखायै  नमः।  ॐविवस्वते कवचाय हुम्   ।ॐ भास्कराय नेत्राय वषट । ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट ।

इस प्रकार “ॐ भास्कराय विद्महे  महातेजाय धीमहि तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्इस  इस प्रकार इस सूर्य गायत्री  मंत्रको 7 बार  पढ़ें।

“आदित्य हृदय स्तोत्रम्”

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्‌ ।

रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्‌ ॥1॥

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्‌ ।

उपगम्याब्रवीद् राममगस्त्यो भगवांस्तदा ॥2॥

राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्मं सनातनम्‌ ।

येन सर्वानरीन्‌ वत्स समरे विजयिष्यसे ॥3॥

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्‌ ।

जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्‌ ॥4॥

सर्वमंगलमागल्यं सर्वपापप्रणाशनम्‌ ।

 चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वर्धनमुत्तमम्‌ ॥5॥

 रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्‌ ।

पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्‌ ॥6॥

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावन: ।

एष देवासुरगणांल्लोकान्‌ पाति गभस्तिभि: ॥7॥

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिव: स्कन्द: प्रजापति: ।

महेन्द्रो धनद: कालो यम: सोमो ह्यापां पतिः ॥8॥

पितरो वसव: साध्या अश्विनौ मरुतो मनु: ।

वायुर्वहिन: प्रजा प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकर: ॥9॥

आदित्य: सविता सूर्य: खग: पूषा गभस्तिमान्‌ । 

सुवर्णसदृशो भानुर्हिरण्यरेता दिवाकर: ॥10॥

 हरिदश्व: सहस्त्रार्चि: सप्तसप्तिर्मरीचिमान्‌ ।

तिमिरोन्मथन: शम्भुस्त्वष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्‌॥11॥

हिरण्यगर्भ: शिशिरस्तपनोऽहस्करो रवि: । 

अग्निगर्भोऽदिते: पुत्रः शंखः शिशिरनाशन:॥12॥

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजु:सामपारग: ।

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः ॥13॥

आतपी मण्डली मृत्यु: पिगंल: सर्वतापन:।

कविर्विश्वो महातेजो  रक्त:सर्वभवोद्भव: ॥14॥

नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावन: ।

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन्‌ नमोऽस्तुते॥15॥

 नम: पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नम: ।

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नम: ॥16॥

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नम: ।

नमो नम: सहस्त्रांशो आदित्याय नमो नम: ॥17॥

नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नम: ।

नम: पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते ॥18॥

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सुरायादित्यवर्चसे ।

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नम: ॥19॥

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने ।

कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नम: ॥20॥

 तप्तचामीकराभाय हरये विश्वकर्मणे । 

नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे ॥21॥

नाशयत्येष वै भूतं तमेष सृजति प्रभु: ।

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभि: ॥22॥

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठित: ।

एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्‌॥23॥

देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च ।

यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमं प्रभु: ॥24॥

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च ।

कीर्तयन्‌ पुरुष: कश्चिन्नावसीदति राघव ॥25॥

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगप्ततिम्‌ ।

एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि ॥26॥

अस्मिन्‌ क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि ।

एवमुक्ता ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्‌॥27॥

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत्‌ तदा ॥

धारयामास सुप्रीतो राघव प्रयतात्मवान्‌ ॥28॥

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्‌ ।

त्रिराचम्य शूचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्‌ ॥29॥

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थं समुपागतम्‌ ।

सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्‌ ॥30॥

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमना: परमं प्रहृष्यमाण: ।

 निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति ॥31॥

श्रीराम द्वारा सूर्य स्तुति

सूर्य उपासना मंत्र

भगवान भास्कर स्तुति

SURYA MANTRA

मां अन्नपूर्णा स्तोत्रम्

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